आज है देवर्षि नारद का जन्मोत्सव? पढ़ें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, आरती और महत्व

हिंदू धर्म में नारद जयंती का विशेष महत्व है। हर साल ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को देवर्षि नारद के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, नारद मुनि ब्रह्माजी के मानस पुत्र हैं। उन्हें ब्रह्मांड का ‘प्रथम पत्रकार’ या दिव्य संदेशवाहक भी कहा जाता है, क्योंकि वे तीनों लोकों (आकाश, पृथ्वी और पाताल) में सूचनाएं पहुंचाने का कार्य करते थे।

मान्यता है कि नारद जयंती के दिन देवर्षि नारद जी आराधना करने से जातक को शुभ फल की प्राप्ति होती है और जीवन सदैव सुखमय रहता है।

नारद जयंती 2026 का शुभ मुहूर्त
साल 2026 में नारद जयंती की तिथियों को लेकर समय इस प्रकार है:

प्रतिपदा तिथि शुरू: 01 मई, रात 10:52 बजे से

प्रतिपदा तिथि समाप्त: 03 मई, रात 12:49 बजे तक

पूजा की आसान विधि
नारद जयंती के दिन भगवान विष्णु और नारद जी की संयुक्त पूजा करने से जीवन में सुख-शांति आती है।

स्नान और शुद्धि: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। पूरे घर में गंगाजल छिड़ककर शुद्धिकरण करें।

विष्णु पूजा: सबसे पहले भगवान विष्णु की मूर्ति के सामने दीपक जलाएं। उन्हें ताजे फल, फूल, चंदन और कुमकुम अर्पित करें।

तुलसी और भोग: विष्णुजी को पंचामृत का भोग लगाएं। ध्यान रहे कि भोग में तुलसी का पत्ता जरूर हो, क्योंकि इसके बिना उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है।

नारद जी की आराधना: इसके बाद नारद जी का ध्यान करें। मान्यता है कि इस दिन विष्णु मंदिर में बांसुरी भेंट करना बहुत शुभ होता है।

दान-पुण्य: पूजा के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराना या जरूरतमंदों की मदद करना विशेष फलदायी माना जाता है।

क्यों खास हैं नारद मुनि?
नारद मुनि हमेशा ‘नारायण-नारायण’ का जप करते रहते हैं। भले ही उनकी दी गई सूचनाओं से कई बार तात्कालिक रूप से देवताओं या असुरों के बीच तनाव पैदा होता था, लेकिन अंत में उसका परिणाम हमेशा सृष्टि के कल्याण और सत्य की जीत के रूप में ही निकलता था। उनकी पूजा से साधक को बेहतर संवाद कौशल, बुद्धि और ज्ञान का आशीर्वाद मिलता है।

देवर्षि नारद: गंधर्व से ऋषि बनने की कथा
श्रीमद्भागवत पुराण (अध्याय 5 और 6) के अनुसार, देवर्षि नारद अपने पिछले जन्म में ‘उपबर्हण’ नाम के एक अत्यंत रूपवान और कलाप्रेमी गंधर्व थे। उन्हें अपनी गायन कला और दिव्य सौंदर्य पर इतना अहंकार हो गया था कि एक बार भगवान ब्रह्मा की सभा में अप्सराओं के नृत्य के दौरान उन्होंने अपनी मर्यादा लांघ दी। ब्रह्मा जी उनके इस अमर्यादित आचरण और घमंड से अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्हें श्राप दिया कि वे अपने इस वैभवशाली स्वरूप को खो देंगे और अगले जन्म में एक साधारण दासी के पुत्र के रूप में जन्म लेंगे।

इस श्राप के कारण गंधर्व का अहंकार चूर हो गया और उन्होंने एक दासी पुत्र के रूप में जन्म लेकर संतों की निस्वार्थ सेवा शुरू की। संतों की कृपा से उनका मन भगवान विष्णु की भक्ति में रम गया और उन्होंने अपना पूरा जीवन उनकी कठोर तपस्या में लगा दिया। उनकी अटूट श्रद्धा से प्रसन्न होकर आकाशवाणी हुई कि अपनी इस भक्ति के फलस्वरूप वे अगले जन्म में ब्रह्मा के ‘मानस पुत्र’ बनेंगे। यही दासी पुत्र अपनी साधना के बल पर आगे चलकर महान ‘देवर्षि नारद’ कहलाए, जो आज समस्त लोकों में भगवान के संदेशवाहक के रूप में पूजे जाते हैं।

भगवान विष्णु की आरती। (Lord Vishnu Aarti)
ओम जय जगदीश हरे, स्वामी!

जय जगदीश हरे।

भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

ओम जय जगदीश हरे।

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।

स्वामी दुःख विनसे मन का।

सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥

ओम जय जगदीश हरे।

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।

स्वामी शरण गहूं मैं किसकी।

तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥

ओम जय जगदीश हरे।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।

स्वामी तुम अन्तर्यामी।

पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥

ओम जय जगदीश हरे।

तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता।

स्वामी तुम पालन-कर्ता।

मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥

ओम जय जगदीश हरे।

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।

स्वामी सबके प्राणपति।

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