
क्या आपने कभी सोचा है कि हम रोज जो खाना खा रहे हैं, उसका भी जलवायु परिवर्तन पर असर पड़ रहा है? अगर नहीं तो हाल ही की स्टडी इस बारे में खुलासा कर रही है। इसमें भी उन देशों का योगदान सबसे ज्यादा है जिनका रहन-सहन और आय का स्तर हाई है। बता दें कि हाल में फूड जर्नल में प्रकाशित हुई एक स्टडी के मुताबिक, जहां एक तरफ ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में किशोरों और युवाओं का सबसे बड़ा हाथ बताया जाता था तो अब इसमें बुजुर्ग भी शामिल हो गए हैं।
बुजुर्गों का ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान
यह स्टडी बताती है कि दुनिया भर में खाने-पीने से जुड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में किशोरों और युवाओं का सबसे बड़ा हाथ है, लेकिन अब ज्यादा उम्र के लोग भी ग्लोबल डाइटरी ग्रीनहाउस गैस (सीएचजी) उत्सर्जन में तेजी से योगदान करने लगे हैं। ऐसा खासकर ज्यादा आय वाले देशों में देखा जा रहा है।
भारत का भी नाम शामिल
इसमें ज्यादा आय वाले देशों के साथ ज्यादा जनसंख्या वाले देशों का नाम भी शामिल है। स्टडी में बताया गया है कि दुनिया के दो सबसे अधिक आबादी वाले देशों, भारत और चीन में खाने-पीने से होने वाले उत्सर्जन में बढ़ोतरी की मुख्य वजह क्रमशः डेयरी उत्पादों और मांस का सेवन था। इससे पता चलता है कि भारत में, प्रति व्यक्ति उत्सर्जन में बढ़ोतरी डेयरी उत्पादों की वजह से हुई। 2019 में सभी उम्र के लोगों में खाने-पीने से होने वाले कुल उत्सर्जन में बढ़ोतरी का 90 प्रतिशत से अधिक और कुल उत्सर्जन का लगभग आधा हिस्सा इन्हीं उत्पादों का था। चीन में, 2019 में किशोरों और युवाओं, दोनों के लिए प्रति व्यक्ति खाने-पीने से होने वाले कुल उत्सर्जन में मांस से जुड़े उत्सर्जन का हिस्सा 40 प्रतिशत से अधिक था।
खानपान कैसे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में शामिल?
अब सवाल यह है कि आखिर हमारा खानपान कैसे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से जुड़ा हुआ है तो बता दें कि ग्लोबल डाइटरी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का संबंध हमारे खान-पान और भोजन उत्पादन से वायुमंडल में फैलने वाली मीथेन, कार्बन डाइआक्साइड और नाइट्रस आक्साइड जैसी गैसों से है। ब्रिटेन की बर्मिंघम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पालिसी बनाने वालों से कहा है कि वे फूड सिस्टम और सस्टेनेबिलिटी पर इसके असर पर ध्यान दें। यह शोध नेचर फूड जर्नल में प्रकाशित हुआ है।



