महादेव से हुई थी गुरु-शिष्य परंपरा की शुरुआत: पढ़ें गुरु पूर्णिमा

आषाढ़ और सावन का संधिकाल लोकसंस्कृति और आध्यात्मिकता के सुहावने संगम का प्रतीक है। इस समय मनाई जाने वाली गुरु पूर्णिमा हमारी संस्कृति में कृतज्ञता, श्रद्धा और जड़ों से जुड़ने का एक महान पर्व है…

आषाढ़ की विदाई और सावन की अगवानी का वह सुहावना संधिकाल, जब तपती धरती पर पहली फुहार पड़ती है, तो माटी से उठने वाली सोंधी गमक सीधे आत्मा में उतर जाती है। पूरब से उठती काली घटाएँ जब आसमान में छा जाती हैं, तो लगता है जैसे प्रकृति अपना श्रृंगार कर रही हो। इसी ऋतु-संधि पर आता है पावन गुरु पूर्णिमा का पर्व। गाँवों में इस दिन का उल्लास निराला होता है।

बारिश की रिमझिम फुहारों के बीच आँगन में मिट्टी के चूल्हे पर गुड़ की लप्सी पकती है, जिसकी सोंधी-मीठी महक पूरे घर-आँगन को सुवासित कर देती है। साथ में गरमा- गरम बिड़ई (उड़द दाल की पूरी) और मसालेदार घुइयाँ (अरबी) की सब्ज़ी। यह केवल भोजन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, लोकजीवन और कृतज्ञता का प्रसाद है। यह उत्सव हमारे अन्नदाता किसान की कृतज्ञता का भी पर्व है। किसान अपनी फसल का अंतिम अंश श्रद्धापूर्वक अपने इष्ट, अपने गुरु और इस प्रकृति को अर्पित करता है। गुड़ की लप्सी और बिड़ई-घुइयाँ का यह भोग मानो प्रकृति से कहता है, हे मेघ, हे प्रकृति, हे विधाता! यह तुम्हारी कृपा का प्रसाद है। इसे स्वीकार करो और अगली बार फिर आना। यही फिर आओ की मनुहार भारतीय लोकजीवन का दर्शन है, जहाँ जो प्राप्त होता है, उसे कृतज्ञता के साथ लौटा भी दिया जाता है।

प्रकृति के प्रति यही कृतज्ञता जब आध्यात्मिक जीवन में उतरती है, तो गुरु-पूजन बन जाती है। जैसे सावन की वर्षा धरती की प्यास बुझाती है, वैसे ही गुरु का ज्ञान जन्म-जन्मांतर के अज्ञान की तपन शांत करता है। गोस्वामी तुलसीदास रामचरितमानस के मंगलाचरण में लिखते हैं
श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि।
अर्थात गुरुचरणों की धूल से मन रूपी दर्पण को निर्मल किए बिना ईश्वर का साक्षात्कार संभव नहीं। आगे वे हनुमान जी की स्तुति करते हुए प्रार्थना करते हैं कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।
अर्थात, हे प्रभु! मुझ पर वैसी ही कृपा कीजिए जैसी गुरु अपने शिष्य पर करता है। क्योंकि ईश्वर कर्मों का हिसाब माँग सकता है, लेकिन गुरु करुणा का सागर होता है। वह शिष्य के दोष नहीं देखता, बल्कि उसे अपनी शरण में लेकर पार लगा देता है। हनुमान जी स्वयं श्रीराम के अनन्य भक्त हैं, किंतु उनके जीवन में मर्यादा, ज्ञान और सेवा का प्रकाश श्रीराम से ही प्रस्फुटित हुआ। भक्ति परंपरा में श्रीराम उनके आराध्य, मार्गदर्शक और जीवन के परम प्रेरणास्रोत हैं। महाभारत में अर्जुन जैसे महावीर भी कुरुक्षेत्र में मोहग्रस्त हो गए थे। तब श्रीकृष्ण ने गुरु बनकर उन्हें गीता का अमृत दिया।
श्रीभगवद्गीता (2.7) में अर्जुन कहते हैं – शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।

अर्थात, मैं आपका शिष्य हूँ, मुझे उपदेश दीजिए। उस क्षण कृष्ण केवल सखा नहीं, बल्कि जगद्गुरु थे। उन्होंने अर्जुन के संशयों को दूर कर धर्म का मार्ग दिखाया। एक सच्चा गुरु वही है जो रणभूमि में आपके साथ खड़ा रहे, आपके रथ की रास थामे और आपको धर्म के मार्ग पर चलाए। इसलिए भारतीय परंपरा में गुरु केवल शिक्षा देने वाला नहीं, बल्कि संकट में दिशा देने वाला होता है। गुरु और शिष्य का संबंध शाश्वत है। यह शिक्षक और छात्र के संबंध से आगे बढ़कर श्रद्धा, विश्वास और आत्मसमर्पण की दीक्षा है। भारत की संपूर्ण ज्ञान परंपरा इसी गुरु-शिष्य परंपरा की आधारशिला पर टिकी है।

सनातन परंपरा में भगवान शिव को आदिगुरु माना गया है। मान्यता है कि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन हिमालय के कांतिसरोवर तट पर उन्होंने सप्तर्षियों को योग, ध्यान, प्राणायाम और आत्मज्ञान का उपदेश दिया। वर्षों की तपस्या और समर्पण के बाद वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम और जमदग्नि ऋषि उनके शिष्य बने। शिव ने उन्हें ब्रह्मज्ञान प्रदान कर निर्देश दिया कि इस योग, धर्म और विज्ञान को संपूर्ण मानवता तक पहुँचाएँ। इसी परंपरा से गुरु-शिष्य संबंध का शुभारंभ हुआ और भारतीय ज्ञानधारा विश्व तक पहुँची।

गुरु पूर्णिमा का संबंध महर्षि वेदव्यास से भी है। वेदों का संकलन, महाभारत की रचना और अठारह पुराणों की परंपरा भारतीय ज्ञान की अमूल्य धरोहर है। इसलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। इसी कारण आज भी गुरु की पीठिका को व्यास गद्दी या व्यासपीठ कहा जाता है। गुरु ही ज्ञान की दिशा देता है और साधना का मार्ग प्रशस्त करता है। संगीत, नृत्य, अभिनय, साहित्य या किसी भी कला की सिद्धि समर्थ गुरु के बिना संभव नहीं मानी गई है। बचपन में हम फल, मिठाई और फूलों की माला लेकर गुरु के पास जाते थे, उनका पूजन करते, चरण स्पर्श करते और श्रद्धापूर्वक दक्षिणा अर्पित करते थे। आज गुरु प्रत्यक्ष नहीं हैं, तो उनके चित्र का पूजन होता है। अब हमारे शिष्य गुरु पूर्णिमा पर आते हैं और हम सब मिलकर अपने गुरु का स्मरण एवं पूजन करते हैं।

यही परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी श्रद्धा, समर्पण और संस्कार का प्रवाह बनाए रखती है।हमारी लोकसंस्कृति में गुरु पूर्णिमा का स्वरूप अत्यंत आत्मीय रहा है। गाँवों में लोग अपने गुरुओं, पुरोहितों, कथा-वाचकों, संगीत और कला के आचार्यों के यहाँ जाकर अन्न, फल, गुड़, वस्त्र और दक्षिणा अर्पित करते थे। यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि कृतज्ञता का संस्कार था। समय और जीवनशैली भले बदल गई हो, किंतु लोकजीवन में यह भावना आज भी यथावत जीवित है।

आज ज्ञान के साधन असंख्य हो गए हैं, पर विवेक देने वाला गुरु दुर्लभ होता जा रहा है। इंटरनेट जानकारी दे सकता है, लेकिन जीवन का अर्थ, धैर्य, मर्यादा और करुणा केवल गुरु ही सिखा सकता है। इसीलिए गुरु पूर्णिमा की तुलना किसी अन्य दिवस से नहीं की जा सकती।

आधुनिक समाज में शिक्षक सम्मान के अनेक अवसर हैं, किंतु भारतीय गुरु परंपरा का भाव कहीं अधिक व्यापक और आध्यात्मिक है। गुरु केवल अक्षरज्ञान नहीं, बल्कि ब्रह्मज्ञान देता है। गुरु फीस नहीं माँगता, वह शिष्य का अहंकार माँगता है। शिक्षक हमें पुस्तकें पढ़ना सिखाता है, जबकि गुरु जीवन पढ़ना सिखाता है। शिक्षक संसार में सफलता का मार्ग दिखाता है, पर गुरु जीवन की सार्थकता और अंततः मुक्ति का पथ प्रशस्त करता है। इसीलिए हमारे शास्त्रों में कहा गया है—

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।

गुरु को साक्षात् त्रिदेव और परब्रह्म के समान माना गया है। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि भारतीय अनुभव और साधना की परंपरा है। क्या विश्व की किसी अन्य संस्कृति में गुरु को परब्रह्म का ऐसा स्थान प्राप्त है? शायद नहीं। इस गुरु पूर्णिमा पर, जब बाहर सावन की फुहारें बरसें और पुरबिया बयार बह रही हो, तब अपनी जड़ों की ओर अवश्य लौटिए।

माटी के चूल्हे पर बनी गुड़ की लप्सी की मिठास को केवल स्वाद तक सीमित मत रहने दीजिए, उसे अपने व्यवहार, वाणी और जीवन में भी उतारिए। उस गुरु को स्मरण कीजिए जिसने आपके जीवन के आषाढ़ को सावन में बदला, अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान का प्रकाश दिया। क्योंकि गुरु ही वह शक्ति है जो मनुष्य को मनुष्य से महामानव बनाने की क्षमता रखती है। जैसे वर्षा सूखी धरती को हरियाली देती है, वैसे ही गुरु कृपा मनुष्य के अंतःकरण को ज्ञान, करुणा और जीवन की हरियाली से भर देती है।

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